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ग़ज़ल
तिरा आना ही अब मरकूज़ है हम को दम-ए-आख़िर
ये जी सदक़े किया था फिर न आवे तन में या आवे
मीर तक़ी मीर
नज़्म
शाम को रास्ते पर
अपनी पाबंदी से दम घुट के फ़साना बन जाए
मिरी आँखों में तो मरकूज़ है रौज़न का समाँ
मीराजी
ग़ज़ल
न हो आज़ाद दौर-ए-चर्ख़ की हल्क़ा-ब-गोशी से
तिरा मरकूज़ दिल-ए-माओ-शुमा और ईन-ओ-आँ तक है
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
अचानक गर वो बे-आमद ही कमरे में बरामद हो
तवज्जोह हम ने तो मरकूज़ बाम-ओ-दर पे रक्खी है
अब्दुल अहद साज़
कुल्लियात
ख़ूँ कुछ न था हमारा मर्कूज़-ए-ख़ातिर उस को
लिल्लाह इक हमें भी यूँ दरमियान मारा




