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ग़ज़ल
सिपह-गरी तो बुज़ुर्गों के साथ दफ़्न हुई
हमें तो आज फ़न-ए-क़ील-ओ-क़ाल आता है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
सिपह-गरी तो बुज़ुर्गों के साथ दफ़्न हुई
हमें तो आज फ़न-ए-क़ील-ओ-क़ाल आता है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था
बद्र-ए-आलम ख़लिश
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aqall-e-martaba
अक़ल्ल-ए-मर्तबाاَقَلِّ مَرْتَبَہ
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ग़ज़ल
कोई बादा-कश जिसे मय-कशी का तरीक़-ए-ख़ास न आ सका
ग़म-ए-ज़िंदगी की कशा-कशों से कभी नजात न पा सका
नरेश एम. ए
ग़ज़ल
अहल-ए-वफ़ा से तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ कर लो पर इक बात कहें
कल तुम इन को याद करोगे कल तुम इन्हें पुकारोगे
इब्न-ए-इंशा
शेर
अहल-ए-वफ़ा से तर्क-ए-तअल्लुक़ कर लो पर इक बात कहें
कल तुम इन को याद करोगे कल तुम इन्हें पुकारोगे
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कातिक का चाँद
चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका
घास शबनम में शराबोर है शब है आधी
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
झुलसी सी इक बस्ती में
हाँ देखा कल हम ने उस को देखने का जिसे अरमाँ था
वो जो अपने शहर से आगे क़र्या-ए-बाग़-ओ-बहाराँ था
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
इल्म-ओ-हुनर है मुल्क को दरकार आज-कल
हम ख़ुद भले-बुरे के हैं मुख़्तार आज-कल