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ग़ज़ल
क्यूँ न जज़्ब हो जाएँ इस हसीं नज़ारे में
रौशनी का झुरमुट है मस्तियों का घेरा है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
इश्क़ की म'असूमियों का ये भी इक अंदाज़ था
हम निगाह-ए-लुत्फ़-ए-जानाँ से भी शरमाया किए
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
बरसात की बहारें
झड़ियों की मस्तियों से धूमें मचा रहे हैं
पड़ते हैं पानी हर जा जल-थल बना रहे हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वो कैसी औरतें थीं
जो अपनी बेटियों को स्वेटर बुनना सिखाती थीं
सिलाई की मशीनों पर कड़े रोज़े बताती थीं
असना बद्र
ग़ज़ल
यकसाँ है हुस्न-ओ-इश्क़ की सर-मस्तियों का रंग
उन की ख़बर उन्हें है न मेरी ख़बर मुझे
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
नज़्र-ए-कॉलेज
मा'सूमियों के जुर्म में बदनाम भी हुए
तेरे तुफ़ैल मूरिद-ए-इल्ज़ाम भी हुए
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
अख़्तर शीरानी
नज़्म
गुरेज़
वो फिर झुका किसी दर पर ग़ुरूर-ए-बरनाई
वो फिर किसानों के मजमे' पे गन-मशीनों से
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सामान दीवाली का
मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई
पुकारते हैं कि ''ला ला! दिवाली है आई''