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नज़्म
रुख़्सत ऐ बज़्म-ए-जहाँ
رخصت اے بزم جہاں! سوئے وطن جاتا ہوں ميں
آہ! اس آباد ويرانے ميں گھبراتا ہوں ميں
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मैं शम्अ-ए-बज़्म-ए-आलम-ए-इम्काँ किया गया
इंसानियत को देख के इंसाँ किया गया
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी
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ग़ज़ल
निगार-ख़ाना-ए-बज़्म-ए-जहाँ की बात करो
शराब-ओ-सब्ज़ा-ओ-आब-ए-रवाँ की बात करो
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
ग़ज़ल
कोई समझे तो क्या समझे कोई जाने तो क्या जाने
किसी का 'अक्स हूँ आईना-दार-ए-बज़्म-ए-हैरत हूँ
शाह मोहसिन दानापुरी
ग़ज़ल
और कोई बात सर-ए-बज़्म-ए-सुख़न कब निकली
बस तिरी बात ही निकली है यहाँ जब निकली
मेहदी बाक़र ख़ान मेराज
क़ितआ
हम-नशीं उफ़ इख़्तिताम-ए-बज़्म-ए-मय-नोशी न पूछ
हो रहा था इस तरह महसूस होश आने के ब'अद
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
वासिल उस्मानी
ग़ज़ल
कहने को शम-ए-बज़्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ हूँ मैं
सोचो तो सिर्फ़ कुश्ता-ए-दौर-ए-जहाँ हूँ मैं
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
'मीर'
शाहिद-ए-बज़्म-ए-सुख़न नाज़ूरा-ए-मअ'नी-तराज़
ऐ ख़ुदा-ए-रेख़्ता पैग़मबर-ए-सोज़-अो-गुदाज़
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
नक़ाब-ए-बज़्म-ए-तसव्वुर उठाई जाती है
शिकस्त-ख़ुर्दों की हिम्मत बढ़ाई जाती है

