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ग़ज़ल
सोज़-ए-'मानी' का ज़माने में है किस को एहसास
आज फिर दर्द मिरे पहलू में बेकार उठा
सुलैमान अहमद मानी
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ग़ज़ल
तिरी उम्मीद-ए-वस्ल-ए-हूर है इक ज़ोहद पर मब्नी
मगर वाइ'ज़ मुझे हर शेवा-ए-रिंदाना आता है
मानी जायसी
ग़ज़ल
ये मता-ए-ज़ीस्त भी होती है 'मानी' नज़्र-ए-मौत
इक नज़र आँखों में है और एक हसरत दिल में है