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ग़ज़ल
वो दाना-ए-सुबुल ख़त्मुर-रुसुल मौला-ए-कुल जिस ने
ग़ुबार-ए-राह को बख़्शा फ़रोग़-ए-वादी-ए-सीना
अल्लामा इक़बाल
हम्द
मुन्कशिफ़ हैं तुझ पे असरार-ओ-रुमूज़-ए-जुज़्व-ओ-कुल
आइना हैं तेरी नज़रों में जहाँ के सब निकात
अलक़मा शिबली
ग़ज़ल
मक़्सद-ए-इश्क़ हम-आहंगी-ए-जुज़्व-ओ-कुल है
दर्द ही दर्द सही दिल बू-ए-दम-साज़ तो दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
नाइब-ए-ख़ालिक-ए-कुल हूँ मैं ज़मीं पर 'तसनीम'
गर्दिश-ए-वक़्त मुसलसल है मिरे ही दम से
तसनीम अब्बास क़ुरैशी
नअत
उन्हीं की ज़ात-ए-अक़्दस मक़्सद-ए-तख़्लीक़-ए-कुल ठहरी
न वो होते तो पैदा कोई भी 'आलम नहीं होता
साबित ख़ैराबादी
नअत
मालिक-ए-कुल ने बनाया है उन्हें क़ासिम-ए-कुल
कोई क्या समझेगा क्या क्या हैं रसूल-ए-'अरबी
फ़ैसल क़ादरी गुन्नौरी
ग़ज़ल
आरिज़ तेरे शम्अ' सफ़ा हैं राहबर-ए-कुल-अहल-ए-वफ़ा हैं
पहूँचा अपने मक़्सद तक इस रौशनी में परवाना भी