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ग़ज़ल
बहुत नाज़ुक हैं मेरे सर्व क़ामत तेग़ज़न लोगो
हज़ीमत ख़ुर्दगी मेरी सफ़-ए-लश्कर पे लिख देना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
तय कर चुके सुख़न की बुलंदी तो दफ़अ'तन
'इक़बाल'-ओ-'मीर'-ओ-'ग़ालिब'-ओ-'फ़ानी' से डर लगा
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
कुल्लियात
'मीर'-ए-गुम-कर्दा चमन ज़मज़मा-पर्दाज़ है एक
जिस की लय दाम से ता-गोश-ए-गुल आवाज़ है एक
मीर तक़ी मीर
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lashkar be miir , takiya be faqiir , faqiir be piir , tarkash be tiir
लश्कर बे मीर , तकिया बे फ़क़ीर , फ़क़ीर बे पीर , तर्कश बे तीर لَشْکَر بے مِیر ، تَکْیَہ بے فَقِیر ، فَقِیر بے پِیر ، تَرکَش بے تِیر
लश्कर का कोई सरदार, तकीए का कोई फ़क़ीर, फ़क़ीर का कोई गुरु और तीर दान में कोई तीर ना हो तो वो बेकार है
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कुल्लियात
मरता था जिस की ख़ातिर उस की तरफ़ न देखा
'मीर'-ए-सितम-रसीदा ज़ालिम ग़यूर क्या था
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
जो अब्र दश्त में बरसे तो हम उड़ावें ख़ाक
वो 'मीर'-ए-आब है हम याँ के 'मीर'-ए-सामाँ हैं
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
मुख़्तलत तरसा-बचों से शीरा-ख़ाने में रहा
किन ने देखा मस्जिदों में 'मीर’-ए-काफ़िर-केश को
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
मे'मार का वो लड़का पत्थर है उस की ख़ातिर
क्यों ख़ाक में मिला तू ऐ 'मीर'-ए-दिल-शिकस्ता
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
कहता है वो तो एक की दस 'मीर'-ए-कम-सुख़न
उस की ज़बाँ के ओहदे से क्यूँकर निकल सके
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
सोहबत किसू से रखने का उस को न था दिमाग़
था 'मीर'-ए-बे-दिमाग़ को भी क्या बला दिमाग़
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
रात दिन सुनता है नाले यूँ नहीं कहता कभू
'मीर'-ए-दिल-आज़ुर्दा को किन ने सताया है अबस
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
आशिक़ जहाँ हुआ है बे-ढंगियाँ ही की हैं
इस मीर-ए-बे-ख़िरद ने कब ढब से दिल लगाया