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ग़ज़ल
किसी सूरत टपकता ज़ख़्म दिल का कम नहीं होता
ये ज़ख़्म-ए-दिल है ये मिन्नत-कश-ए-मरहम नहीं होता
नईम हामिद अली
ग़ज़ल
दर्दमंदान-ए-अज़ल रखते नहीं दरमाँ का ग़म
सीना-ए-सद-चाक गुल मिन्नत-कश-ए-मरहम नहीं