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शेर
रोना बिना-ए-ख़ाना-ख़राबी है मिस्ल-ए-शम्अ'
टपके जो सक़्फ़-ए-चश्म हो तो क़स्र-ए-तन ख़राब
इमदाद अली बहर
रुबाई
है अक़्ल की बज़्म आलिमों रौशन
ख़ुद गरचे हैं मिस्ल-ए-शम्अ' घुलते जाते
सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़
ग़ज़ल
तिश्नगी की तफ़्सीरें मिस्ल-ए-शम्अ हैं 'वामिक़'
जो ज़बान खुलती है उस से लौ निकलती है
वामिक़ जौनपुरी
ग़ज़ल
वो शख़्स आया था ऐ 'शम्अ' ले के मौसम-ए-गुल
उसे ख़बर ही न थी दर्द मेरा ज़ेवर था
सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ
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नज़्म
जलियाँ-वाला बाग़
तेरे छलनी दिल के ज़ख़्मों की जलन
मिस्ल-ए-शम्अ'-ए-हुर्रियत है ज़ौ-फ़गन
राम लाल वर्मा हिंदी
ग़ज़ल
हुजूम-ए-ग़म सँभलता ही नहीं ऐ 'शम्अ'' अब मुझ से
कभी तो काश ऐसा हो मुझे तन्हा करे कोई
सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ
ग़ज़ल
नाम रौशन कर के क्यूँकर बुझ न जाता मिस्ल-ए-शम्अ'
ना-मुवाफ़िक़ थी ज़माने की हवा मेरे लिए
मीर अनीस
ग़ज़ल
'शम्अ'' इतना तो कभी उस की समझ में आए
डूबती कश्ती का साहिल से तक़ाज़ा क्या है
सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ
शेर
सर काट क्यूँ जलाते हैं रौशन दिलाँ के तईं
आहन-दिली पे ख़ल्क़ की ख़ंदाँ हूँ मिस्ल-ए-शम्अ'
मिर्ज़ा दाऊद बेग
ग़ज़ल
जुदाई में जलेगा तेरी मिस्ल-ए-शम्अ' दिल मेरा
अगर की बत्तियाँ बन कर जलेंगी हड्डियाँ मेरी