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ग़ज़ल
यूँ मुकाफ़ात-ए-अमल सब कुछ उठा कर ले गया
सर-फिरा सैलाब बस्ती को बहा कर ले गया
मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल
ग़ज़ल
ख़ूगर-ए-सई-ए-मुकाफ़ात-ए-अमल बन के 'अतीक़'
फ़ाएदा तू भी हर आसानी-ओ-मुश्किल से उठा
अतीक़ अहमद अतीक़
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ग़ज़ल
मुकाफ़ात-ए-'अमल देखो उन्हों ने ख़्वाब छीने थे
हक़ीक़त मैं ने पा ली और वो हारे छीनने वाले
माजिद आसी
ग़ज़ल
क़ातिल को मुकाफ़ात-ए-‘अमल मिल के रहेगी
मक़्तूल का हर क़तरा-ए-ख़ूँ बोल रहा है
साक़िब क़मरी मिस्बाही
नज़्म
आवाज़-ए-आदम
मुकाफ़ात-ए-अमल तारीख़-ए-इंसाँ की रिवायत है
करोगे कब तलक नावक फ़राहम हम भी देखेंगे
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
जो दुख की फ़स्ल बोई है तो अब दुख काटना होगा
मुकाफ़ात-ए-अमल समझे इशारा हो गया होता
सबीला इनाम सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
किस ने बदला नक़्श-ए-कोहना दहर की तस्वीर का
ये मुकाफ़ात-ए-'अमल है या लिखा तक़दीर का
मीर अंजुम परवेज़
ग़ज़ल
मुकाफ़ात-ए-'अमल से कौन बच सकता है ऐ 'अर्शी'
जो दाने बोए हैं अच्छे-बुरे सब फलने वाले हैं
अर्शी बस्तवी
ग़ज़ल
मैं निमट आया हूँ बे-मेहरी-ए-याराँ से कि अब
सब की रंजिश को मुकाफ़ात-ए-'अमल लिखना है