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ग़ज़ल
इस क़दर मज़बूत मौसम पर रही किस की गिरफ़्त
मैं कि मुझ से सीना-ए-आब-ओ-हवा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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ग़ज़ल
आ ऐ 'असर' मुलाज़िम-ए-सरकार-ए-गिर्या हो
याँ जुज़ गुहर ख़ज़ाने में तनख़्वाह ही नहीं
क़ाएम चाँदपुरी
नज़्म
ये दर्द अब के सिवा है हद से
वो ख़्वाब-ए-मौसम गुज़र चुके हैं
ग़ुबार आँखों में भर चुके हैं
कहकशाँ तबस्सुम
ग़ज़ल
बे-कैफ़ी-ए-मौसम का ये उज़्र है बे-मा'नी
लग जाएँगे फूलों के अम्बार चले आओ