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ग़ज़ल
हम 'मुंतज़िर' इतना न समझते थे उसे लेक
ख़ूब उस बुत-ए-ख़ुद-साज़ को देखा तो ग़ज़ब है
मुंतज़िर लखनवी
ग़ज़ल
'मुंतज़िर' इस दिल-ए-बेताब के हाथों शब-ए-वस्ल
क्या कहें तुम से मियाँ जो न हुआ था सो हुआ
मुंतज़िर लखनवी
ग़ज़ल
राज़ थोड़े आओ खोलें उस ख़ुदा के मुंतज़िर
इस ज़मीं पर आसमाँ की हुक्मरानी देख कर
मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी
ग़ज़ल
फिर भी कुछ दिल को तसल्ली सी तो होती है 'मुनीर'
गो कभी मुंतज़िर-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा न रहा
मुनीर भोपाली
ग़ज़ल
हैं किसी इशारे के मुंतज़िर कई शहसवार खड़े हुए
कि हो गर्म फिर कोई मा'रका मिरे ज़ब्त-ए-हाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
वा'दा कर के भी न तुम आओ तुम्हारा इख़्तियार
हम करेंगे रात-दिन फिर भी तुम्हारा इंतिज़ार
नरेश एम. ए
ग़ज़ल
शिकवा-ए-वादा-ख़िलाफ़ी का मिला अच्छा जवाब
पेशगी रक्खी थी इक उम्मीद बर आई हुई