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शेर
दिल सदा तड़पे है मेरा मुर्ग़-ए-बिस्मिल की तरह
या कि सीखी मुर्ग़-ए-बिस्मिल ने मिरे दिल की तरह
राय सरब सुख दिवाना
ग़ज़ल
हमेशा ख़ाक-ओ-ख़ूँ में मुझ को बेताबी बिठाया की
ब-शक्ल-ए-मुर्ग़-ए-बिस्मिल कौन से पहलू नहीं फड़का
नसीम देहलवी
ग़ज़ल
ख़ल्क़ पर होती जो आदाब-ए-शहादत आश्कार
मुर्ग़-ए-बिस्मिल भी तड़पने की इजाज़त माँगता
इमदाद अली बहर
ग़ज़ल
जिस ने खाया है तिरे अबरू-ए-ख़ूँ-रेज़ का ज़ख़्म
मुर्ग़-ए-बिस्मिल सा लहू बीच रला हाए रला
सिराज औरंगाबादी
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murG-e-bismillaah
मुर्ग़-ए-बिस्मिल्लाह مُرْغ بِسم اللہ
۔मुज़क्कर।बिसमिल्लाह अलरहमन अलरहीम मुर्ग़ की सूरत में लिखते हैं
murG-e-bismil kii tarah ta.Dapnaa
मुर्ग़-ए-बिस्मिल की तरह तड़पना مُرْغِ بِسمِل کی طَرح تَڑَپنا
ज़बह किए हुए परिंदे की तरह तड़पना, निहायत तकलीफ़ में होना , बहुत बेचैन होना
murG-e-bismil kii tarah pha.Daknaa
मुर्ग़-ए-बिस्मिल की तरह फड़कना مُرْغِ بِسمِل کی طَرَح پَھڑَکنا
ज़बह किए हुए परिंदे की तरह तड़पना, निहायत तकलीफ़ में होना , बहुत बेचैन होना
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ग़ज़ल
ये सफ़्फ़ाकियाँ हैं तो जूँ मुर्ग़-ए-बिस्मिल
हमें ख़ाक ओ ख़ूँ में मिला कर रहेंगी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
मेरी बर्क़-ए-आह दिल में ही तड़प कर रह गई
मुर्ग़-ए-बिस्मिल की तरह ना-आश्ना परवाज़ से
सय्यद अनीसुद्दीन अहमद रीज़वी अमरोहवी
नज़्म
ग़रीबों का ख़ुदा कोई नहीं
दफ़'अतन ठोकर लगी और चलते चलते गिर पड़ा
मुर्ग़-ए-बिस्मिल दम के दम में बन गया वो नीम-जाँ
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
ग़ज़ल
मैं ने कब रोक के रक्खा तुम्हें जान-ए-'बिस्मिल'
ज़ेहन-ओ-दिल क्या है मिरी रूह में दाख़िल हो जाओ