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शेर
मिरे दिल में है कि पूछूँ कभी मुर्शिद-ए-मुग़ाँ से
कि मिला जमाल-ए-साक़ी को ये तनतना कहाँ से
अब्दुल मजीद सालिक
ग़ज़ल
मिरे दिल में है कि पूछूँ कभी मुर्शिद-ए-मुग़ाँ से
कि मिला जमाल-ए-साक़ी को ये तनतना कहाँ से
अब्दुल मजीद सालिक
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ग़ज़ल
याँ बादा-ए-अहमर के छलकते हैं जो साग़र
ऐ पीर-ए-मुग़ाँ देख कि है सारी दुकाँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ठहर ऐ गर्दिश-ए-अय्याम हम भी साथ चलते हैं
उठा लेने दे फ़ैज़-ए-सोहबत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ पहले
अर्श सहबाई
नज़्म
नुक़ूश-ए-फ़िक्र-ओ-‘अमल
है बात हमारी ही कि रिंदों को बहर-तौर
ज़ेर-ए-असर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हम ने किया है
इनाम थानवी
ग़ज़ल
'नज़ीर' हूँ वो शराबी ब-फ़ैज़-ए-पीर-ए-मुग़ाँ
निगाह डाल दूँ जिस पर वो लड़खड़ा के चले
नज़ीर बनारसी
नज़्म
हम लोग
हर्फ़ में क्यों न हमारे हो सुरूर-ए-मय-नाब
ख़ाकसारन-ए-दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हैं हम लोग
अली मीनाई
ग़ज़ल
हिम्मत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ देख ले ज़ाहिद चल कर
कोई मय-ख़ाने से फिरता नहीं साइल ख़ाली
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
ग़ज़ल
मैं ख़र्क़-ए-आदत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ का क़ाएल हूँ
कि ब'अद-ए-ख़र्क़ किया इल्तियाम शीशे में