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क़ितआ
गरचे है मुश्त-ए-ग़ुबार आदम ओ हव्वा का वजूद
उन की रिफ़अत पे बरसते हैं सितारों के सुजूद
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
सिलसिला-ए-मुकालिमात-ए-ख़ुद-कलामी
चाहे अफ़्लाक-ओ-ज़मीन पर
फैल कर छा जाए ये मुश्त-ए-ग़ुबार
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
कुल्लियात
गर साथ ले गड़ा तू दिल-ए-मुज़्तरिब तो 'मीर'
आराम हो चुका तिरे मुश्त-ए-ग़ुबार को
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
हुई ये बर्बाद ज़िंदगानी रही न हस्ती की कुछ निशानी
सबा ने हर चंद ख़ाक छानी न हाथ मुश्त-ए-ग़ुबार आया
इमदाद अली बहर
ग़ज़ल
मिरे ख़ुदा नहीं थमता ये ज़ुल्म का तूफ़ान
और उस के सामने मुश्त-ए-ग़ुबार या'नी मैं
इफ़्तिख़ार राग़िब
ग़ज़ल
दामन से उन के लिपटी कभी रुख़ से जा लगी
क्या क्या मज़े न लूटे हैं मुश्त-ए-ग़ुबार ने
हाजी शफ़ीउल्लाह शफ़ी बहराइची
ग़ज़ल
ऐ मुश्त-ए-ग़ुबार-ए-तन-ए-फ़र्सूदा-ए-आशिक़
उस कू में ज़मीं-गीर है गीव अब तू हवा हो