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KHaar-e-pusht
ख़ार-ए-पुश्त خارِ پُشْت
साही, शल्लकी, एक जंतु जिसकी पीठ पर लंबे काँटे होते हैं, जलीय जानवरों में से एक जानवर जिसके जिस्म में कांटे होते हैं, कटहल, मछली की रीढ़ की हड्डी या खजूर के पत्ते की शक्ल का जंगी हथियार जो ग़रज़ की तरह चलाया जाता है
haivaanaat-e-KHaar-pusht
हैवानात-ए-ख़ार-पुश्त حَیواناتِ خار پُشْت
(حیوانیات) ان حیوانات کے نہ تو ہڈیاں ہوتی ہیں اور نہ لال خون جلد پر اکثر کھریا مٹی کی طرح کھریاں یا خار ہوتے ہیں مثلاً تارا مچھلی (Starfish)
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ग़ज़ल
खो जाऊँ मुश्त-ए-ख़ाक में ऐसा नहीं हूँ मैं
दरिया हूँ अपनी ज़ात में क़तरा नहीं हूँ मैं
एजाज़ अंसारी
शेर
जन्नत-ए-सूफ़िया निसार दहर की मुश्त-ए-ख़ाक पर
आशिक़-ए-अर्ज़-ए-पाक को दावत-ए-ला-मकाँ न दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
जो मुश्त-ए-ख़ाक हो उस ख़ाक-दाँ की बात करो
ज़मीं पे रह के न तुम आसमाँ की बात करो
अब्दुल मजीद सालिक
ग़ज़ल
हूँ मुश्त-ए-ख़ाक मगर कूज़ा-गर का मैं भी हूँ
सो मुंतज़िर उसी लम्स-ए-हुनर का मैं भी हूँ
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
ये मुश्त-ए-ख़ाक मुझ को इक जहाँ मालूम होती है
जो गर्द-ए-कारवाँ है कारवाँ मालूम होती है
लुत्फुल्लाह खां नज़्मी
शेर
पस-ए-मुर्दन भी मुश्त-ए-ख़ाक में कैसी ये वहशत है
उठा करती है आँधी बन के ख़ाक-ए-राएगाँ मेरी
सोज़ होशियारपूरी
ग़ज़ल
ये मुश्त-ए-ख़ाक अपने को जहाँ चाहे तहाँ ले जा
पर इस 'आलम को इस 'आलम से मत बार-ए-गराँ ले जा
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ग़ज़ल
वो मुश्त-ए-ख़ाक जो परवाना-ए-दिल-गीर बनती है
जिगर की आग बुझ जाती है जब इक्सीर बनती है
तालिब देहलवी
नज़्म
'इक़बाल' के मज़ार पर
लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की
मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
उड़ के जो पहुँची सबा के साथ गलियों में तिरी
मुश्त-ए-ख़ाक-ए-कुश्ता-ए-तेग़-ए-अदा थी मैं न था