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ग़ज़ल
जिसे मेहर-ओ-माह देखें ब-निगाह-ए-रश्क 'मूसा'
रह-ए-आशिक़ी में हम तो वो मक़ाम चाहते हैं
मोहम्मद मूसा
ग़ज़ल
सुनाता किस तरह रूदाद-ए-उल्फ़त उन को ऐ 'मूसा'
कि रोब-ए-हुस्न से होंटों पे अफ़्साने नहीं आए
मोहम्मद मूसा
ग़ज़ल
छेड़ा है मैं ने क़िस्सा-ए-मूसा-ओ-कोह-ए-तूर
उस को है वहम ये भी मिरी दास्ताँ न हो