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ग़ज़ल
तेरे से हस्त कुल हुई थी तू अदम में बे-निशाँ
हादी मुज़िल है बरमला बहर-ए-ख़ुदा तू कौन है
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
न जाने आरिबा क्यूँ आए क्यूँ मुस्तारबा आए
मुज़िर के लोग तो छाने ही वाले थे सो वो छाए
जौन एलिया
ग़ज़ल
उफ़ ये सन्नाटा कि आहट तक न हो जिस में मुख़िल
ज़िंदगी में इस क़दर हम ने सुकूँ पाया न था
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
बड़े मूज़ी को मारा नफ़्स-ए-अम्मारा को गर मारा
नहंग ओ अज़दहा ओ शेर-ए-नर मारा तो क्या मारा
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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ग़ज़ल
न हो मुख़िल मिरे अंदर की एक दुनिया में
बड़ी ख़ुशी से बर-ओ-बहर पर हुकूमत कर
राजेन्द्र मनचंदा बानी
नज़्म
सय्यद से आज हज़रत-ए-वाइ'ज़ ने ये कहा
उस ने दिया जवाब कि मज़हब हो या रिवाज
राहत में जो मुख़िल हो वो काँटा है राह का
अकबर इलाहाबादी
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
पड़ चुके बहुत पाले डस चुके बहुत काले
मूज़ियों के मूज़ी को फ़िक्र-ए-नीश-ए-अक़रब क्या
यगाना चंगेज़ी
नज़्म
मेरी शाएरी
मिरी शाएरी बे-क़रारों की दुनिया
वो ज़र्रा कि राह-ए-सुकूँ में मुख़िल है
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
वास्ते मूज़ी के आख़िर में भी मूज़ी बन गया
सर किसी हालत में बे-कुचले न छोड़ा साँप का
रिन्द लखनवी
ग़ज़ल
चंगुल में है मूज़ी के दिल उस चश्म के हाथों
घेरा ये ग़ज़ब पंजा-ए-मिज़्गाँ के लिए है