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नज़्म
ऐ दिल-ए-अफ़सुर्दा
दामन-ए-कोहसार से ठंडी हवा आने लगी
नब्ज़-ए-ख़स में ज़िंदगी का ख़ून दौड़ाने लगी
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
हम-नफ़स-ओ-हबीब-ए-ख़ास बनते हैं ग़ैर किस तरह
बोली ये सर्द-मेहरी-ए-उम्र-ए-गुरेज़-पा कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
सफ़र जारी है सदियों से हमारा नब्ज़-ए-आलम में
निगाहों से ज़माने की मगर रू-पोश रहते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
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ग़ज़ल
कोई बादा-कश जिसे मय-कशी का तरीक़-ए-ख़ास न आ सका
ग़म-ए-ज़िंदगी की कशा-कशों से कभी नजात न पा सका
नरेश एम. ए
नज़्म
अजब है खेल कैरम का
लो उस की शर्त भी सुन लो कि
कनीज़-ए-ख़ास को ले कर ही रानी आप की होगी
इब्न-ए-मुफ़्ती
ग़ज़ल
ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले
ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो 'अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच