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ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था
बद्र-ए-आलम ख़लिश
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शेर
लोग कहते हैं कि फ़न्न-ए-शाइरी मनहूस है
शेर कहते कहते मैं डिप्टी कलेक्टर हो गया
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
कुछ तो समझ सकूँगा नशेब-ओ-फ़राज़-ए-दहर
अच्छा है वक़्त मुझ पे गिराँ है गिराँ रहे
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
हुज़ूर-ए-ख़्वाब देर तक खड़ा रहा सवेर तक
नशेब-ए-क़ल्ब-ओ-चश्म से गुज़र तिरा हुआ नहीं
हम्माद नियाज़ी
ग़ज़ल
रह-ए-तलब में नशेब-ओ-फ़राज़-ए-मंज़िल की
उन्हें ख़बर जो समझते हैं हादसात की बात