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ग़ज़ल
ज़ौक़-ए-मस्ती की मज़म्मत न कर इतनी ऐ शैख़
क्या तुझे नश्शा-ए-ज़ौक़-ए-मय-ए-उल्फ़त भी नहीं
आसी ग़ाज़ीपुरी
नज़्म
लहू पुकारता है
कि उन में अहल-ए-हवस की सदा का सीसा है
वो झुकते रहते हैं लब-हा-ए-इक़तिदार की सम्त
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
साग़र इक और भी दे पीर-ए-मुग़ाँ 'कैफ़ी' को
नश्शा-ए-बे-ख़ूदी-ए-इश्क़ में वो चूर नहीं
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
जब से देखी हैं तिरी मस्त शराबी आँखें
नश्शा-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम बुरा लगता है