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रेख़्ती
सख़ावत का पता कोसों तलक बाजी नहीं मिलता
हुआ हातिम भी क्या जा के निगोड़े सोम का छैला
मीर यार अली जान
ग़ज़ल
कहा गोरी ने कुर्सी पर अदब से बैठना सीखो
निगोड़े तोड़ दीं दो दिन में सारी कुर्सियाँ मेरी
बुलबुल काश्मीरी
रेख़्ती
क्या जाने आगे चल के वो भड़वा करेगा क्या
अच्छा नहीं निगोड़े का जब ऐ बुआ शुरू'
मोहसिन ख़ान मोहसिन
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निगोड़े نِگوڑے
जिसके गोड़ अर्थात् पैर न हों अथवा टूटे हुए हों, अकेला, तन्हा, जिस के आगे पीछे कोई ना हो, निकम्मा, नाकारा, दुशट, चण्डाल
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ग़ज़ल
कभी दिल-हा-ए-बुताँ तुझ से पसीजें ऐ अश्क
तो ये हम जानें कि बस तू ने निचोड़े पत्थर
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
रेख़्ती
मुझे नफ़रत है सूरत से निगोड़े जान-साहब की
वो उस की शक्ल क्या है ऐ बुआ क़ुर्बान की सूरत
मीर यार अली जान
ग़ज़ल
हम हैं निगोड़े हम हैं भगोड़े हम हैं निकम्मे हम काहिल
जिस दम महफ़िल रंग पे होगी हम से रहा न जाएगा
कान्ती मोहन सोज़
नज़्म
नई नस्ल का आख़री नौहा
ये लाग़र कल्मूए नंगे निगोड़े नौनिहालों की तरफ़ देखो
ज़रा सोचो
कैलाश माहिर
ग़ज़ल
निगह-ए-यार को अब क्यूँ है तग़ाफ़ुल ऐ दिल
वो तिरे हाल से ग़ाफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
तू बचा बचा के न रख इसे तिरा आइना है वो आइना
कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
निगाह-ए-बादा-गूँ यूँ तो तिरी बातों का क्या कहना
तिरी हर बात लेकिन एहतियातन छान लेते हैं

