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ग़ज़ल
निकहत-ए-ज़ुल्फ़ को हम-रिश्ता-ए-जाँ कहता हूँ
होश आता है तो ख़्वाब-ए-गुज़राँ कहता हूँ
रविश सिद्दीक़ी
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ग़ज़ल
निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-सनम से याँ मो'अत्तर है दिमाग़
कोई मुश्क-ए-चीं कोई मुश्क-ए-ख़ुतन में मस्त है
बहराम जी
ग़ज़ल
क्यूँ तुझे डर है कि मौत आई तो मर जाऊँगी
मैं तो 'निकहत' हूँ फ़ज़ाओं में बिखर जाऊँगी
निकहत इफ़्तिख़ार
ग़ज़ल
दिल का हिसाब क्या करें दिल तो उसी का माल था
निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं अब के दिमाग़ ले गई
सलीम अहमद
ग़ज़ल
गुल-ओ-नस्रीं के तसव्वुर से मिरी साँसों में
निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-मसीहा-नफ़साँ बाक़ी है
राम कृष्ण मुज़्तर
ग़ज़ल
अब नहीं जन्नत मशाम-ए-कूचा-ए-यार की शमीम
निकहत-ए-ज़ुल्फ़ क्या हुई बाद-ए-सबा को क्या हुआ
अब्दुल मजीद सालिक
शेर
अब नहीं जन्नत मशाम-ए-कूचा-ए-यार की शमीम
निकहत-ए-ज़ुल्फ़ क्या हुई बाद-ए-सबा को क्या हुआ