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ग़ज़ल
निकहत-ए-ज़ुल्फ़ को हम-रिश्ता-ए-जाँ कहता हूँ
होश आता है तो ख़्वाब-ए-गुज़राँ कहता हूँ
रविश सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
गुल-ओ-नस्रीं के तसव्वुर से मिरी साँसों में
निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-मसीहा-नफ़साँ बाक़ी है