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ग़ज़ल
हरम-सरा-ए-नाज़ है कि दर-ए-गह-ए-नियाज़ है
निगाह-ए-नीम-बाज़ भी निगाह-ए-नीम-बाज़ है
पंडित अमर नाथ होशियार पुरी
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ग़ज़ल
सादिक़ुल-क़ौल की पहचान यही है ऐ 'नाज़'
दिल में डर होता है आँखों में हया होती है
शेर सिंह नाज़ देहलवी
ग़ज़ल
सर-ए-नियाज़ दर-ए-नाज़ से उठा न सका
की एक सज्दे में तकमील-ए-बंदगी मैं ने
मोहम्मद इसहाक़ अफ़सर आफ़ाक़ी
ग़ज़ल
सर-ए-नियाज़ की अज़्मत के राज़ जब खुलते
दर-ए-बुताँ से निशान-ए-दर-ए-हरम मिलते
मोहम्मद नक़ी रिज़वी असर
ग़ज़ल
गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो
है दर-ए-दिल पे कोई संग-ए-गिराँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
क्यूँ दर-पय-ए-तलाश हैं अहबाब-ओ-अक़रबा
'परवीं' शहीद-ए-नाज़ को क़ातिल से क्या ग़रज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
देखिए काबिल-ए-क़ुबूल अपनी नमाज़ हो न हो
सज्दा तो कर जबीन-ए-शौक़ दर-गह-ए-नाज़ हो न हो
हयात अमरोहवी
ग़ज़ल
तख़्ता-ए-दार पे लाई निगह-ए-नाज़ मुझे
'इश्क़ ने मान लिया साहिब-ए-ए'ज़ाज़ मुझे
मुनव्वर ताबिश सम्भली
ग़ज़ल
पूछते पूछते आ जाओ मेरे घर की तरफ़
है पता ये कि निशान-ए-दर-ओ-दीवार नहीं
मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी
नज़्म
पछतावा
दर-ओ-दीवार पे हिजरत के निशाँ देख आएँ
आओ हम अपने बुज़ुर्गों के मकाँ देख आएँ
