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ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
उलझ पड़ने में काकुल हो बिगड़ने में मुक़द्दर हो
पलटने में ज़माना हो बदलने में हवा तुम हो
मुज़्तर ख़ैराबादी
समस्त
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नज़्म
शहर-बानो के लिए एक नज़्म
तुम्हें जब देखता हूँ
तो मिरी आँखों पे रंगों की फुवारें पड़ने लगती हैं
रहमान फ़ारिस
ग़ज़ल
आज ख़ूँ हो के टपक पड़ने के नज़दीक है दिल
नोक-ए-नश्तर हो तो हाँ क़ाबिल-ए-तहरीक है दिल
