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नज़्म
बरसात की बहारें
ऊँचा मकान जिस का है पच खना सिवाया
ऊपर का खन टपक कर जब पानी नीचे आया
नज़ीर अकबराबादी
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ग़ज़ल
सुन ऐ क़ासिद उन्हें ज़िद है तो हम को बात की पच है
मुनासिब वो अगर समझें तो ये तकरार रहने दें
बेख़ुद देहलवी
ग़ज़ल
कुछ हर बद-ज़न कुछ वो बद-ज़न दोषी अब किस को ठहराएँ
उल्टी-सीधी बात की पच पर याराने बदनाम हुए
मुज़फ़्फ़र शिकोह
ग़ज़ल
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
रक़ीब से!
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है


