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ग़ज़ल
उलूम चौदह मक़ूला दस और जिहात सित्ता बनाए उस ने
उमूर-ए-दुनिया को ताकि पहुंचाएँ ख़ूब सा इंसिराम तीसों
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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ग़ज़ल
फिर चाहे चौक या कि मुकारिम नगर को जाएँ
पहुंचाएँ पहले जा के मिरी माँ के घर मुझे
साजिद सजनी लखनवी
ग़ज़ल
उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रिफ़ाक़त का एहसास
जब उस के मल्बूस की ख़ुश्बू घर पहुँचाने आई है
जौन एलिया
ग़ज़ल
कोई मक़्तल में न पहुँचा कौन ज़ालिम था जिसे
तेग़-ए-क़ातिल से ज़ियादा अपना सर अच्छा लगा
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे
मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत तिरे नाम तक न पहुँचे