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नज़्म
उरूस-उल-बिलाद
चहल-पहल में भिड़ों जैसी भनभनाहट में
किसी को पकड़ो सर-ए-राह मार दो चाहे
अख़्तरुल ईमान
ग़ज़ल
उम्र आख़िर है जुनूँ कर लूँ बहाराँ फिर कहाँ
हाथ मत पकड़ो मिरा यारो गिरेबाँ फिर कहाँ
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
समस्त
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नज़्म
सियाह सायों की तिश्नगी में
सहर की नाज़ुक हवा की उजली कलाई पकड़ो
बदन की पीली बरहनगी को बयान कर दो
आदिल मंसूरी
ग़ज़ल
हमारा दिल दुखाना कुछ हँसी या खेल समझे हो
समझ पकड़ो जवाँ हो अब न जाओ तुम लड़कपन पर