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ग़ज़ल
कलीम आजिज़
नज़्म
बदन से पूरी आँख है मेरी
हम चाहें तो सूरज हमारी रोटी पकाए
और हम सूरज को तंदूर करें
सारा शगुफ़्ता
समस्त
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नज़्म
ख़ूब-सूरत मोड़
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेश-क़दमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
नज़्म
कोई ये कैसे बताए
इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामन
उन के सीने में समा जाए हमारी धड़कन
