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ग़ज़ल
जब ब-फ़ैज़ान-ए-जुनूँ परचम-ए-ज़र खुलते हैं
क़ुफ़्ल-ए-शब तोड़ के अनवार-ए-सहर खुलते हैं
अख़्तर ज़ियाई
नज़्म
पहला जश्न-ए-आज़ादी
हर एक बाम पे इक परचम-ए-ज़र-अफ़्शाँ है
हर एक सम्त निगारान-ए-यासमीं-पैकर
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
अलम-नशरह हुआ सिर्र-ए-ख़फ़ी हिज़्यान-ए-मस्ती में
असर था 'ज़ार' ये शुर्ब-ए-शराब-ए-हाल-ए-विज्दाँ का
पंडित त्रिभुवननाथ ज़ुतशी ज़ार देहलवी
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ग़ज़ल
इसी मिट्टी का ग़म्ज़ा हैं मआरिफ़ सब हक़ाएक़ सब
जो तुम चाहो तो इस जुमले को लौह-ए-ज़र पे लिख देना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
जब भी महताब-ए-ज़र-अफ़्शाँ के हो चेहरे पे नक़ाब
जान हम रख के हथेली पर उलट देते हैं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
कैसे करूँ मैं ज़ब्त-ए-राज़ तू ही मुझे बता कि यूँ
ऐ दिल-ए-ज़ार शरह-ए-राज़ मुझ से भी तू छुपा कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
नरेश एम. ए
ग़ज़ल
हज़ार शर्म करो वस्ल में हज़ार लिहाज़
न निभने देगा दिल-ए-ज़ार ओ बे-क़रार लिहाज़