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ग़ज़ल
अजब दस्तूर है अबरार इस दुनिया-ए-बे-पर का
शिकस्ता-रंग पत्तों पर फ़िदा शबनम नहीं होती
ख़ालिद अबरार
नज़्म
शिकवा
क़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़
ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़
अल्लामा इक़बाल
नअत
गिरते पड़ते दर-ए-सरकार तक आ पहुँचा है
हम से पूछे कोई इक ताइर-ए-बे-पर के मज़े
पीर नसीरुद्दीन शाह नसीर
ग़ज़ल
ताइर-ए-बे-पर बचे क्या दाम से सय्याद के
ज़द में जब सारी फ़ज़ा-ए-गुल्सिताँ तक आ गई
मुस्लिम मलेगाँवी
ग़ज़ल
नावक-ए-बे-पर अगर है उस की मिज़गान-ए-दराज़
क़ौस क्यों समझे न आशिक़ अबरू-ए-ख़मदार को
मोहम्मद इब्राहीम आजिज़
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर उस के लबों पर हँसी रही लेकिन
दम-ए-विदाअ' वो दर-पर्दा बे-क़रार भी था
सय्यदा शान-ए-मेराज
कुल्लियात
क्या करें बेकस हैं हम बेबस हैं हम बे-घर हैं हम
क्यूँकर उड़ कर पहुँचें उस तक ताइर-ए-बे-पर हैं हम
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
पर किए हैं जो अता ताक़त-ए-परवाज़ भी दे
या तो मैं खुल के उड़ूँ या मुझे बे-पर कर दे