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ग़ज़ल
पस-ए-चिलमन हैं तो चिलमन को उठा ही दीजे
इस तकल्लुफ़ पे नुमाइश का गुमाँ होता है
कमाल अहमद सिद्दीक़ी
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रेख़्ता शब्दकोश
kaajal sab ko.ii de par chitvan bhaa.nt bhaa.nt
काजल सब कोई दे पर चितवन भाँत भाँतکاجَل سَب کوئی دے پَر چِتْوَن بھانْت بھانْت
काजल सब आँखों में लगाते हैं मगर किसी किसी को भला मालूम देता है
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ग़ज़ल
देखिए उस बुत-ए-काफ़िर के सताने की अदा
ख़्वाब में दिखता है तो भी पस-ए-चिलमन-चिलमन
रेशमा नाहीद रेशम
नज़्म
यादें
हाए वो नुक़रई आवाज़ वो तीखे ख़द-ओ-ख़ाल
पस-ए-चिलमन वो नज़ारों का जहाँ याद आया
कामिल चाँदपुरी
ग़ज़ल
न रहा धुआँ न है कोई बू लो अब आ गए वो सुराग़-जू
है हर इक निगाह गुरेज़-ख़ू पस-ए-इश्तिआ'ल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
ये जो कहा कि पास-ए-इश्क़ हुस्न को कुछ तो चाहिए
दस्त-ए-करम ब-दोश-ए-ग़ैर यार ने रख दिया कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
देख लेना पस-ए-क़ातिल भी कोई होगा ज़रूर
सिर्फ़ क़ातिल ही चलाता नहीं ख़ंजर देखो