आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "pesh-e-zaalim"
अत्यधिक संबंधित परिणाम "pesh-e-zaalim"
अन्य परिणाम "pesh-e-zaalim"
ग़ज़ल
जाने किस मोड़ पे क्या हादिसा पेश आ जाए
मुस्तक़िल जेब में हम अपना पता रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
आरज़ू में तेरी ऐ गुल-पोश शहज़ादी न पूछ
कैसे आलम-ताब सरदारोँ के सर जाते रहे
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
पेश करता है छुपा कर ग़म-ए-पिन्हाँ लेकिन
उस की तहरीर का हर ज़ेर-ओ-ज़बर चीख़ता है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
बता ज़ालिम मिरे क़ासिद ने तेरा क्या बिगाड़ा था
जो ले कर फाड़ डाला दस्त-ए-बे-तक़्सीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अपना मिट्टी का पियाला हम को प्यारा है बहुत
हम न देंगे पेश अगर वो साग़र-ए-जम भी करें
शकील इबन-ए-शरफ़
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
मैं क़फ़स में हूँ क़फ़स पेश-ए-निगाह-ए-सय्याद
पर-ए-पर्वाज़ में जुम्बिश का गुमाँ होता है
उरूज ज़ैदी बदायूनी
ग़ज़ल
गरचे पेश-ए-ताक़-ए-अबरू-ए-सनम गेसू नहीं
का'बा पर नर्ग़ा हुआ है लश्कर-ए-कुफ़्फ़ार का
हैदर अली आतिश
कुल्लियात
सर्व तो है संजीदा लेकिन पेश-ए-मिसरा-ए-क़द्द-ए-यार
ना-मौज़ूँ ही निकले है जब दिल में अपने तोलें हैं