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ग़ज़ल
जाने किस मोड़ पे क्या हादिसा पेश आ जाए
मुस्तक़िल जेब में हम अपना पता रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
आरज़ू में तेरी ऐ गुल-पोश शहज़ादी न पूछ
कैसे आलम-ताब सरदारोँ के सर जाते रहे
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
पेश करता है छुपा कर ग़म-ए-पिन्हाँ लेकिन
उस की तहरीर का हर ज़ेर-ओ-ज़बर चीख़ता है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
बता ज़ालिम मिरे क़ासिद ने तेरा क्या बिगाड़ा था
जो ले कर फाड़ डाला दस्त-ए-बे-तक़्सीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अपना मिट्टी का पियाला हम को प्यारा है बहुत
हम न देंगे पेश अगर वो साग़र-ए-जम भी करें
शकील इबन-ए-शरफ़
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना