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शेर
ज़ुल्फ़-ए-पुर-पेच के सौदे में अजब क्या इम्काँ
गर उलझ जाए ख़रीदार ख़रीदार के साथ
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
राह-ए-पुर-पेच में गुज़रा वो सफ़र याद आया
अश्क पलकों से गिरे ख़ून-ए-जिगर याद आया
बेगम सुल्ताना ज़ाकिर अदा
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ग़ज़ल
किसी के गेसू-ए-पुर-पेच पर दिल-दार बैठे हैं
वो अब क्या जीत सकते हैं जो बाज़ी हार बैठे हैं
नवाब सैफ अली सय्याफ़
ग़ज़ल
रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा
फिर के बुर्ज-ए-सुंबले में आफ़्ताब आ जाएगा
बहादुर शाह ज़फ़र
शेर
कुछ न देखा फिर ब-जुज़ यक शोला-ए-पुर-पेच-ओ-ताब
शम्अ' तक तो हम ने देखा था कि परवाना गया
मीर तक़ी मीर
नज़्म
नुसरत फ़त्ह अली ख़ान के लिए एक नज़्म
अपनी पुर-पेच बुलंद
और धीमी कशीदा सुरों से ऊँचे
एरुज मुबारक
ग़ज़ल
आज फिर बंद-ओ-सलासिल का ख़याल आया है
ज़ुल्फ़-ए-पुर-पेच का और दिल का ख़याल आया है
मुज़फ़्फ़र शिकोह
ग़ज़ल
शोख़ियाँ आएँगी बढ़ने दो अभी सिन उन का
ज़ुल्फ़-ए-पुर-पेच सिखा देगी फँसाना दिल का