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कुल्लियात
कुश्ता हूँ उस हया का कटवाए बुहतों के सर
पर आँखें उस की वूँहीं थीं पुश्त-ए-पा के ऊपर
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ज़ाहिद तिरे कमाल पे मारें हैं पुश्त-ए-पा
लाए फ़रो सर अपना जो पीर-ए-मुग़ाँ की ओर
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
कुल्लियात
ज़िन्हार पुश्त-ए-पा से नहीं उठती उस की आँख
उस चश्म-ए-शर्मगीं को बहुत है हया से रब्त
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
न ऐ रश्क-ए-बहार आँखें उठावे पुश्त-ए-पा से तू
हथेली पर अगर सरसों तिरे आगे जमाऊँ मैं
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
गरचे नज़र है पुश्त-ए-पा पर लेकिन क़हर क़यामत है
गड़ जाती है दिल में हमारे आँख उस की शर्माई हुई
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
नज़र उस की हया से 'मीर' पुश्त-ए-पा पर अक्सर है
किन्हों ने काहे को उस की सी चश्म-ए-शर्मगीं देखी
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
पुश्त-ए-पा मारे हैं शाही पर गदा-ए-कू-ए-इश्क़
देखो तुम याँ का ख़ुदा के वास्ते दस्तूर टुक