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शेर
क़मर जलालवी
ग़ज़ल
'ख़ुमार' किस ने किया फिर से दर-ब-दर मुझ को
ये किस ने मुझ को मुसलसल सफ़र में रक्खा है
सुलेमान ख़ुमार
शेर
मुद्दतों बाद जो इस राह से गुज़रा हूँ 'क़मर'
अहद-ए-रफ़्ता को बहुत याद किया है मैं ने
क़मर मुरादाबादी
शेर
जल्वा-गर बज़्म-ए-हसीनाँ में हैं वो इस शान से
चाँद जैसे ऐ 'क़मर' तारों भरी महफ़िल में है
क़मर जलालवी
ग़ज़ल
मुद्दतों बाद जो इस राह से गुज़रा हूँ 'क़मर'
अहद-ए-रफ़्ता को बहुत याद किया है मैं ने
