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शेर
राह-ए-हक़ में खेल जाँ-बाज़ी है ओ ज़ाहिर-परस्त
क्या तमाशा दार पर मंसूर ने नट का किया
असद अली ख़ान क़लक़
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ग़ज़ल
मुहम्मद राशिद अतहर
ग़ज़ल
राह-ए-हक़ में जो हर इक चीज़ लुटाता है 'कशिश'
उस की झोली को ख़ुदा ग़ैब से भर देता है
कशिश संदेलवी
ग़ज़ल
जो राह-ए-हक़ में मरने के लिए तय्यार हो जाए
नज़र में उस की बाज़ीचा फ़राज़-ए-दार हो जाए
ख़लील-उर-रहमान राज़
ग़ज़ल
राह-ए-हक़ पर हमें रखना हैं अकेले ही क़दम
साथ देगा न हमारा ये जहाँ जानते हैं
अन्जुमन मंसूरी आरज़ू
नज़्म
रूह-ए-तग़ज़्ज़ुल
मिटा कर अपनी हस्ती राह-ए-हक़ में खुल गईं आँखें
कि मर कर ज़िंदगी का राज़-ए-पिन्हाँ देख लेता हूँ
लाला अनूप चंद आफ़्ताब पानीपति
ग़ज़ल
राह-ए-हक़ पहले से मुश्किल नज़र आती है हमें
ख़ुश न हो कोई अगर पाँव में छाले कम हैं
