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ग़ज़ल
हमें ही ताब-ए-समाअ'त न हो सकी 'राहत'
फ़साना-ख़्वाँ ने तो छेड़ा था ज़िक्र-ए-अहद-ए-तरब
अमीन राहत चुग़ताई
ग़ज़ल
हाल जब पूछा तो 'राहत' हो न पाया ज़ब्त-ए-हाल
दफ़अ'तन आँचल में वो चेहरा छुपा कर रो पड़े
इल्यास राहत
ग़ज़ल
घिर भी जाओ जो अँधेरों में कहीं तुम 'राहत'
फिर भी नज़रों में तुम अपनी मह-ओ-अख़्तर रखना
इल्यास राहत
ग़ज़ल
खुली आँखें भी हों मिलना सँभल कर फिर भी ऐ 'राहत'
दरिंदे भी छुपे अब जिस्म-ए-इंसानी में रहते हैं
इल्यास राहत
ग़ज़ल
'राहत' मिलेंगे और भी कुछ क़द्र-दान-ए-ज़ीस्त
देखा तो कीजे ख़ुद से भी हट कर गहे गहे