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ग़ज़ल
ये ज़र्रे जिन को हम ख़ाक-ए-रह-ए-मंज़़िल समझते हैं
ज़बान-ए-हाल रखते हैं ज़बान-ए-दिल समझते हैं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
फ़सील-ए-शब
दामन-ए-दिल पे ग़ुबार-ए-रह-ए-मंज़िल है अभी
पा-ए-अफ़्कार में देरीना सलासिल है अभी
क़ैसर-उल जाफ़री
ग़ज़ल
ये समझ लो नाशनास-ए-रह-ए-मंज़िल-ए-वफ़ा है
जो क़दम क़दम पे पूछे अभी कितना फ़ासला है
मख़्दूम ज़ादा मुख़्तार उस्मानी
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ग़ज़ल
गुज़र जा राह-ओ-मंज़िल से गुज़र जा मौज-ओ-साहिल से
मोहब्बत हो तो ये आसानियाँ मिलती हैं मुश्किल से
शाहिद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
हम राह-रव-ए-मंज़िल दुश्वार रहे हैं
हर तरह मुसीबत में गिरफ़्तार रहे हैं