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नज़्म
कातिक का चाँद
मीर-ए-मग़्फ़ूर के अशआर न पैहम पढ़ना
जीने वालों को अभी और भी जीना होगा
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
उठी मौज-ए-सबा जुम्बाँ से शाख़-ए-आशियाँ पैहम
चली जाती है गोया कश्ती-ए-बुलबुल समुंदर में
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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नज़्म
तक़ाज़ा
बारिश-ए-ग़महा-ए-पैहम से फ़ज़ा है सोगवार
आप जाते हैं तो दम भर मुस्कुराते जाइए
जौहर निज़ामी
ग़ज़ल
अब मैं हूँ और लुत्फ़-ओ-करम के तकल्लुफ़ात
ये क्यूँ हिजाब-ए-रंजिश-ए-बे-जा बना दिया
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
क़ौम से ख़िताब
बे-हिसी इफ़्लास और बुग़्ज़-ओ-अदावत तुझ में है
रंजिश-ए-बेजा-ओ-कीना और नफ़रत तुझ में है
अमीन सलौनवी
ग़ज़ल
बशर ने ही नहीं समझे रुमूज़-ए-गर्दिश-ए-पैहम
रुमूज़-ए-गर्दिश-ए-पैहम मह-ओ-अख़्तर समझते हैं
कुलदीप गौहर
ग़ज़ल
गए वो दिन कि दिल सरमाया-दार-ए-दर्द-ए-पैहम था
मगर आँखों की अब तक मीर-सामानी नहीं जाती