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ग़ज़ल
मीर अली औसत रशक
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ग़ज़ल
तू ही संग-ए-मील है अपने लिए सुल्तान-'रश्क'
अपने ही रस्ते में जो हाइल है वो पत्थर भी तू
सुलतान रशक
ग़ज़ल
खो चुका है उस को जब तो ख़ुद ही ऐ सुल्तान-'रश्क'
अब धड़कता है दिल-ए-बे-मुद्द'आ किस के लिए
सुलतान रशक
ग़ज़ल
अपने ख़द-ओ-ख़ाल देखूँ मैं भी ऐ सुल्तान-'रश्क'
मेरी आँखों से मगर ऐ ख़्वाब के मंज़र निकल
सुलतान रशक
ग़ज़ल
'रश्क'-साहब मैं असीर-ए-जुर्म-ए-ना-मा'लूम हूँ
कैसे मुमकिन है मुझे नाकामियों की ख़ू न हो
सुलतान रशक
ग़ज़ल
मिस्ल-ए-औराक़-ए-शजर रंज-ए-ख़िज़ाँ में ऐ 'रश्क'
जिस को देखा कफ़-ए-अफ़सोस ही मलते देखा