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ग़ज़ल
रत्ब-उल-लिसाँ है मौज तो गौहर है तर वहाँ
दरिया मुहीत है तिरे फ़ैज़-ए-अमीम का
मोहम्मद ज़करिय्या ख़ान
हास्य
ये जवाँ चप्पल थी अपने हाल पर वाँ नौहा-ख़्वाँ
और मियाँ घेसू की थी ईमान की रत्ब-उल-लिसाँ
ग़ुलाम अहमद फ़रीद
ग़ज़ल
हम्द-ओ-सना में तेरी मैं रत्ब-उल-लिसाँ रहूँ
जब तक रहे दहन में ज़बाँ को सुख़न से रब्त
सय्यद अमीर हसन बद्र
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ratb-ul-lisaanii
रत्ब-उल-लिसानी رَطْبُ الْلِسانی
मीठी भाषा बोलना, मीठे बोल का काम
ratb-ul-lisaa.n rahnaa
रत्ब-उल-लिसाँ रहना رَطْبُ اللِّساں رَہْنا
किसी की मदह में सर करम रहना, किसी की सना में हरवक़त मशग़ूल रहना
ratb-ul-lisaan honaa
रत्ब-उल-लिसान رَطْبُ اللِّسان ہونا
शुगफ़ता ज़बानी के साथ बोलना, तहा-ए-दिल से लब खोलना, तर ज़बान होना, ज़बान से फूओल बरसाना
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ग़ज़ल
सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़
नज़्म
मेरा वतन हिन्दोस्तान
तेरे हर गुलशन में पंछी नग़्मा-ख़्वाँ
आशियाँ-दर-आशियाँ रत्ब-उल-लिसाँ
फ़ीरोज़ा यासमीन
ग़ज़ल
जिस तरफ़ भी जाइए है गूँगी आँखों का हुजूम
बे-सबब आँखों को अब रत्ब-उल-लिसाँ रखता हूँ मैं
वाहिद नज़ीर
ग़ज़ल
पुखराज के गिलासों में है लाला-गूँ शराब
सोने का पानी पी के है रतब-उल-लिसाँ बसंत
मुनीर शिकोहाबादी
नज़्म
मोहब्बत के इस बे-कराँ सफ़र में
कहीं औलाद की जूया ज़ौजा-ए-ज़करया है तू
इंजील ओ क़ुरआन सब तेरे रतब-उल-लिसान