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हिंदी ग़ज़ल
ग़ज़ल-गोई ये अफ़्साने रिसाले और तहरीकें
किताबत सच-कलामी हाए सारे काम ख़तरे में
नूर मोहम्मद नूर
शेर
इश्क़ के मज़मूँ थे जिन में वो रिसाले क्या हुए
ऐ किताब-ए-ज़िंदगी तेरे हवाले क्या हुए
अबु मोहम्मद सहर
नज़्म
एक भूली हुइ याद
तुम भी मुझ से सारे रिश्ते तोड़ चुकी थीं
मैं ने भी इक दूसरा रस्ता देख लिया था

