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ग़ज़ल
ग़ैर-मुमकिन है तिरे घर के गुलाबों का शुमार
मेरे रिसते हुए ज़ख़्मों के हिसाबों की तरह
परवीन शाकिर
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नज़्म
ज़िंदगी
क़ल्ब-ए-आदम के ये रिसते हुए कोहना नासूर
अपने एहसास से है फ़ितरत-ए-इंसाँ मजबूर
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
फिर वही कुंज-ए-क़फ़स
बोल! चटगाँव की मज़लूम ख़मोशी कुछ बोल
बोल ऐ पीप से रिसते हुए सीनों की बहार
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
हर घड़ी बढ़ती हुई तिश्ना-लबी इश्क़ तिरी!
दिल के रिसते हुए ज़ख़्मों से बुझाता हुआ मैं
