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कुल्लियात
न पाया दिल हुआ रोज़-ए-सियह से जिस का जा लट-पट
किसू की ज़ुल्फ़ ढूँडी मू-ब-मू काकुल को सब लट-लट
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
मेरे लहजे में जो ठहराव नहीं आया 'रोज़'
क्या मिरी तल्ख़ी-ए-हिजरत को नहीं जानते हो
रिज़वाना सईद रोज़
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roz-e-siyaah dekhnaa
रोज़-ए-सियाह देखना روزِ سیِاہ دیکْھنا
आफ़त और मुसीबत में मुबतला होना, अदबार और बद इक़बाली का सामना होना
roz-e-siyah dekhnaa
रोज़-ए-सियह देखना روزِ سِیَہ دیکْھنا
आफ़त और मुसीबत में मुबतला होना, अदबार और बद इक़बाली का सामना होना
roz-e-siyaah dikhaanaa
रोज़-ए-सियाह दिखाना روزِ سِیاہ دِکھانا
मुसीबत में मुबतला करना, परेशानी में डालना
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ग़ज़ल
कहता था कोई शम्अ-रुख़ देख मिरे चराग़-ए-शब
कोई किरन बचा के रख रोज़-ए-सियाह के लिए
ख़्वाज़ा रज़ी हैदर
कुल्लियात
ज़ुल्फ़-ए-सियाह उस की जाती नहीं नज़र से
उस चश्म-ए-रू-सियह ने रोज़-ए-सियह दिखाया
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
काकुल में नहीं ख़त में नहीं ज़ुल्फ़ में नहीं
रोज़-ए-सियह के साथ मिरा दिल किधर गया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
चश्म-ए-अंजुम पे नहीं अब्र से वो रोज़-ए-सियाह
जो मिरे दीदा-ए-ख़ूँ-नाब-चकाँ पर आया