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ग़ज़ल
है मिरा दश्त-ए-जुनूँ सात आसमानों से दो-चंद
रुब-ए-मस्कूँ वादी-ए-वहशत की चौथाई नहीं
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
दयार-ए-दोस्त में उश्शाक़ बेचारे जहाँ बैठे
पकड़ कर कान उठाया ख़ाक-रूब-ए-कू-ए-जानाँ ने
शौक़ बहराइची
ग़ज़ल
जा कभी नज्द की जानिब भी 'अज़ीज़'
रूह-ए-मजनूँ को ज़रा शाद तो कर
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
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ग़ज़ल
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
ग़ज़ल
दश्त-ए-वहशत में बगूला था कि दीवाना तिरा
रूह-ए-मजनूँ बहर-ए-इस्तिक़बाल आ कर ले गई
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
आशिक़ ओ माशूक़ की हाए निभे किस तरह
उन को कुदूरत का शौक़ मुझ को सफ़ाई का इश्क़