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ग़ज़ल
है मिरा दश्त-ए-जुनूँ सात आसमानों से दो-चंद
रुब-ए-मस्कूँ वादी-ए-वहशत की चौथाई नहीं
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
दयार-ए-दोस्त में उश्शाक़ बेचारे जहाँ बैठे
पकड़ कर कान उठाया ख़ाक-रूब-ए-कू-ए-जानाँ ने
शौक़ बहराइची
ग़ज़ल
जा कभी नज्द की जानिब भी 'अज़ीज़'
रूह-ए-मजनूँ को ज़रा शाद तो कर
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
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ग़ज़ल
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
ग़ज़ल
रुख़-ए-इंसानियत पर भीगे जूते मार देती है
यहाँ पर भूक अब मासूम बच्चे मार देती है
मशकूर ममनून क़न्नौजी
ग़ज़ल
है इसी में क़ल्ब-ए-महज़ूँ शर्तिया कहता हूँ मैं
खोल मुट्ठी तेरी चोरी मह-लक़ा पकड़ी गई