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ग़ज़ल
शुक्र-ए-ख़ुदा कि ज़ुल्म से मा'ज़ूर है फ़लक
बर्तानिया है ख़ल्क़ की ग़म-ख़्वार आज-कल
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
यार है ख़ंजर-ब-कफ़ और जाँ-निसारों का हुजूम
हाए ये किस जुर्म में ख़ल्क़-ए-ख़ुदा पकड़ी गई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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rujuu'-e-KHalq
रुजू'-ए-ख़ल्क़ رجوع خلق
प्रार्थना, जनता का किसी की ओर आकर्षण, जैसे-किसी साधु की ओर या किसी वैद्य की ओर
saa.ii.n terii yaad me.n jas tan kiitaa KHaak, sonaa us ke ruu-bruu hai chuulhe kii KHaak
साईं तेरी याद में जस तन कीता ख़ाक, सोना उस के रू-बरू है चूल्हे की ख़ाक سائِیں تیری یاد میں جس تَن کِیتا خاک، سونا اُس کے رُوبرو ہے چُولھے کی خاک
जो ईश्वर में लीन हो गया हो उस की नज़र में संसार का धन और दौलत धूल के समान है
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नज़्म
जुस्तुजू का एहतिजाज
क़तार-दर-क़तार सिंफ़-हा-ए-ख़ल्क़ देखती हुई
क़ज़ा भी ठहर कर नज़र बचा के देखने लगी
अब्दुल्लाह साक़िब
ग़ज़ल
वो ज़िंदा हम हैं कि हैं रू-शनास-ए-ख़ल्क़ ऐ ख़िज़्र
न तुम कि चोर बने उम्र-ए-जावेदाँ के लिए
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
फ़र्त-ए-हुजूम-ए-ख़ल्क़ से हों बंद रास्ते
वो रश्क-ए-यूसुफ़ आए जो बाज़ार की तरफ़
राजा गिरधारी प्रसाद बाक़ी
ग़ज़ल
दाग़-ए-ग़म-ए-वतन है निशान-ए-अज़ीज़-ए-ख़ल्क़
दिल पर न जिस का नक़्श हो ये वो नगीं नहीं
दत्तात्रिया कैफ़ी
नज़्म
राह-नुमा बन जाऊँ
उन ज़ईफ़ों के सहारे को असा बन जाऊँ
ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ का हर सम्त में चर्चा कर दूँ
हामिदुल्लाह अफ़सर
ग़ज़ल
कूचा है तिरा वादा-गह-ए-ख़ल्क़ कि जिस में
दो-चार जो बैठे हैं तो दो-चार खड़े हैं