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ग़ज़ल
रुख़सार-ए-तर से ताज़ा हो बाग़-ए-अदन की याद
और उस की पहली सुब्ह की वो रसमसाहटें
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
सुलगना अंदर अंदर मिस्रा-ए-तर सोचते रहना
बदन पर डाल कर ज़ख़्मों की चादर सोचते रहना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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रेख़्ता शब्दकोश
aa.iina-e-ruKHsaar par gard-e-malaal honaa
आईना-ए-रुख़सार पर गर्द-ए-मलाल होनाآئینۂ رخسار پر گردِ ملال ہونا
चेहरे से दुख प्रकट होना
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ग़ज़ल
क्या पिघलता जो रग-ओ-पै में था यख़-बस्ता लहू
वक़्त के जाम में था शोला-ए-तर ही कितना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
कहती ही तिरी नाफ़-ओ-शिकम देख के बुलबुल
रुख़्सार-ए-गुल-ए-तर पे है नर्गिस की धरी आँख
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
ग़ज़ल
ये तो सच है कि शब-ए-ग़म को सँवारा तुम ने
चश्म-ए-तर ने भी मिरा साथ निभाया है बहुत