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ग़ज़ल
आब-रूद-ए-ज़ीस्त के कुछ घूँट ज़हरीले भी हों
मैं ने कब चाहा था हर क़तरा मुझे इक्सीर हो
राग़िब अख़्तर
कुल्लियात
रूद-ए-दैर के पानी से या आब-ए-चाह से उस जा के
वास्ते ताअ'त-ए-कुफ़्र के मैं दोनों वक़्त नहाउँगा
मीर तक़ी मीर
नज़्म
वही कश्फ़-ए-ज़ात की आरज़ू
तू मिरा नसीब है राह-रौ
ये हवा ये बर्क़ ये रा'द-ओ-अब्र ये तीरगी
नून मीम राशिद
कुल्लियात
यूँ न रोओ तो न रोओ वर्ना रूद-ओ-चाह से
हर क़दम इस दश्त में पैदा है चश्म-ए-गिर्या-नाक
मीर तक़ी मीर
नज़्म
गुजरात की रात
हाए वो मस्त घटा हाए वो सलमा की अदा
आह वो रूद-ए-चनाब आह वो गुजरात की रात