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ग़ज़ल
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
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ग़ज़ल
बुतान-ए-माह-वश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
कि जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
बुतान-ए-माह-वश इस घर की अक्सर सैर करते हैं
मिरा दिल और जिगर भी जा के बुत-ख़ाने में रख देना
मोहम्मद उमर
ग़ज़ल
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
छुप न सका हिजाब में इश्वा-ए-हुस्न-ए-ख़ुद-नुमा
आया जो माह ओढ़ कर चादर-ए-ज़र-निगार-ए-शब
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
अमीक़ ज़ख़्म इस क़दर ब-दस्त-ए-रोज़-ओ-शब मिले
कि मुंदमिल न कर सकी दवा-ए-माह-ओ-साल तक
अज़ीम हैदर सय्यद
नज़्म
कुछ नहीं के दो पहलू
नहीं हैं जो तनवीर-ए-दिल माह-वश
शब-ए-माह में भी मज़ा कुछ नहीं